अध्याय ३— 'गुरु-परीक्षा
की तैयारी और रहस्य!
अर्जुन पंडित ने अपने कक्ष में प्रवेश किया। कक्ष का वातायन
संध्या की अरुणिमा से आलोकित था। आकाश में रक्त-धवल रश्मियाँ छिटक रही थीं, मानो स्वयं देवताओं की दृष्टि इस परीक्षा
की तैयारी पर टिकी हो।
अर्जुन पंडित ने एकाग्र चित्त से अपने हृदय-पटल पर ध्यान केंद्रित किया। जैसे ही उसने मन के अन्तरंग में अवगाहन किया, तभी ‘ज्ञान सागर का अद्भुत द्वार एक बार पुनः उसकी चेतना में प्रकट हुआ।
यह वह रहस्यमय ग्रंथालय था, जहाँ सम्पूर्ण
विश्व की विद्या, शास्त्र और कलाएँ सूक्ष्म रूप में संचित
थीं।
वह मन ही मन बोला —
" ज्ञान सागर! इस बार मुझे गुरु-परीक्षा के लिए तैयारी करनी
है। मुझे उन समस्त विषयों की उच्चतम पुस्तकें प्रदान कर, जो अकादमी की परीक्षा में उपयोगी
हों!"
क्षणमात्र में दिव्य
ज्योति से आलोकित असंख्य ग्रंथ उसके मानस में प्रकट हुए।
— ‘शरीरशास्त्रम्’,
— ‘तंत्रविद्या’,
— ‘औषधिज्ञानम्’,
— ‘धातुशास्त्रम्’,
— ‘युद्धविद्या’,
— ‘संवादशास्त्रम्’ इत्यादि असंख्य ग्रंथों के शीर्षक स्वर्णाक्षरों
में चमकने लगे।
प्रत्येक पुस्तक अर्जुन पंडित के आत्मबोध में अवतरित होकर ऐसे समाहित हो रही
थी, मानो शाश्वत काल से वह सब ज्ञान उसी में स्थित रहा हो।
किन्तु अर्जुन पंडित ने केवल संकलन पर संतोष नहीं किया। उसने वह
कार्य किया, जो सामान्य विद्वानों
के लिए असंभव था —
उसने प्रत्येक ग्रंथ की त्रुटियाँ, अपूर्णताएँ
और विरोधाभास खोजे।
‘ज्ञान सागर’
का अद्भुत गुण यही था — किसी भी विषय का सम्पूर्ण ज्ञान, उसकी
त्रुटियों सहित प्रकट हो जाता था।
वह मन ही मन प्रत्येक
शास्त्र के दोषों का आलोकन कर, उन्हें
अपने मन के अन्तराल में संशोधित करता गया।
— शरीरशास्त्र में उसने दृष्ट किया कि पूर्वाचार्यों ने यकृत (liver)
की मरम्मत-विधि को अधूरा छोड़ा है।
— युद्धविद्या में पाया कि आघात-प्रतिघात के सूत्रों में सूक्ष्म
दोष विद्यमान हैं।
— औषधिज्ञान में यह जाना कि विषहरण के कुछ सूत्र अभी तक भ्रांत हैं।
अर्जुन पंडित ने अपने अन्तरंग से कहा —
"यदि मैं इन त्रुटियों को सुधारकर परीक्षा में प्रस्तुत करूँ,
तो न केवल उत्तीर्ण होऊँगा, अपितु समस्त
गुरु-मण्डल भी चकित हो जाएगा।"
इस प्रकार उसने 'पूर्ण-शास्त्र-संहिता' का सृजन आरम्भ किया।
— ग्रंथों के दोष दूर कर, उसने ऐसी
विद्या-संहिता संचित की, जो अब तक किसी भी गुरु या आचार्य के
पास नहीं थी।
सप्ताह के प्रथम तीन
दिवसों में वह प्रायः अपने कक्ष में स्थित रहा। युवती-शिष्या भोजन, जल और आवश्यक सामग्री का उपबंध करती रही।
वह स्वयं भी आश्चर्यचकित थी कि उसके गुरु इतने अल्पकाल में किस दिव्य ज्ञान की
साधना कर रहे हैं।
चतुर्थ दिवस के प्रातःकाल, जब सूर्योदय की रश्मियाँ भूमि को स्वर्णाभ
कर रही थीं, अर्जुन पंडित ने आँखें खोलीं। उसके नेत्रों में तेजस्वी कांति
थी। उसके मुखमण्डल पर दिव्य आनन्द की छाया थी। वह मन ही मन बोला —
"अब समय आ गया है — इस पूर्ण विद्या को अभ्यास में लाने
का!"
उसने युवती से कहा —
"शिष्या! आज मैं अभ्यास करूँगा। जो जो परीक्षा में पूछा जाएगा,
उसका अभ्यास हम यहीं कर लेंगे।"
युवती ने विनीत भाव से सिर
झुकाकर आज्ञा मानी।
अर्जुन पंडित ने उसके शरीर
के 'ऊर्जा-चक्रों' (Meridians) की
परीक्षा की। उसके स्वास्थ्य-तंत्र का सूक्ष्म विश्लेषण किया।
तत्पश्चात उसने मूक संवाद, मन्त्र-पाठ,
औषध-विधान, युद्ध-कौशल, और
तत्वचर्चा — समस्त विषयों पर उसके साथ अभ्यास आरम्भ किया।
युवती चकित थी — अर्जुन
पंडित के प्रत्येक उत्तर, उपाय और नीति इतनी प्रखर और निर्दोष थी कि
उसे लगा मानो वह स्वयं आचार्य-मण्डल के समक्ष बैठी हो।
सप्ताह का शेष समय इस
अभ्यास और अनुष्ठान में व्यतीत हुआ। अर्जुन पंडित के ज्ञान-रत्नों की कौमुदी रात-दिन उज्ज्वल होती
गई।
सप्तम दिवस की संध्या जब
अकादमी के शंखध्वनि से यह घोषण हुआ कि "कल प्रातः गुरु-परीक्षा आरम्भ होगी"
तब अर्जुन पंडित ने आकाश की ओर दृष्टि उठाई और मन ही मन कहा — अब
वह समय आ गया है — जब मेरे द्वारा संचित यह अद्वितीय ज्ञान संसार के समक्ष प्रकट
होगा।"
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