अध्याय १ -शिष्य का चुनाव

"ठग! महान ठग!"

एक उग्र गर्जना आकाश में गूँज उठी। नीलाभ पत्थर-खंडों से बने पथ पर दौड़ती पदचापों की ध्वनि वातावरण को चीरती चली गई।

अर्जुन पंडित ने दोनों हाथ विवशता से फैलाए। उसके अधरों पर वेदना मिश्रित प्रत्याख्यान फूट पड़ा —
"
मैं कोई ठग नहीं, प्रभु! मैं तो अकादमी का एक साधारण शिक्षक हूँ... मैं केवल तुम्हें अपना शिष्य बनाना चाहता हूँ। और यह 'महान' उपाधि देकर तुम मेरे अपराध को ऐसा चित्रित कर रहे हो मानो मैं अनन्तकालिक दोष का भागी हूँ !"

मौन के क्षण में, स्मृतियों की शृंखला उसके मानस-पटल पर अंकित हो उठी — निदेशक की चेतावनी-रूप वाणी :

"यह सत्र का सत्रहवाँ अवसर है! यदि आज भी कोई छात्र न मिला, तो कल ही अपना संसार समेट लेना होगा!"

वह इस अकादमी का सबसे विपन्न, सबसे उपेक्षित शिक्षक ।

जहाँ अन्य शिक्षकों की कक्षाएँ जिज्ञासुओं से भरपूर थीं, उसकी कक्षा में एकाकीपन का साम्राज्य था। यदि वह किसी शिष्य को मनाकर लाता भी, तो वह उसे 'ठग' कहकर पलायन कर जाता।

पिछले वर्ष की शिक्षक-योग्यता परीक्षा में वह सम्पूर्ण अकादमी में अंतिम स्थान पर था। यहाँ तक कि अकादमी के इतिहास में प्रथम बार किसी को पूर्ण शून्य अंक मिले थे।

अब, नूतन सत्र के प्रारंभ में, अकादमी ने अंतिम चेतावनी दी थी —
"
यदि इस वर्ष भी कोई शिष्य न मिला, तो शिक्षक-पद से वंचित कर दिए जाओगे!"

आज, उसके हाथों से सत्रह संभावित शिष्य फिसल चुके थे। जैसे ही कोई उसका नाम सुनता, वह घबराकर ऐसे भागता मानो कोई कन्या किसी अजनबी अधेड़ पुरुष से भयभीत हो।

"मुझे किसी एक को मनाने का उपाय खोजना ही होगा!"

वह यह विचार ही कर रहा था कि द्वार की ओर दृष्टिपात किया। वहाँ एक नवयौवना आश्चर्यचकित मुद्रा में खड़ी थी।

"क्या मैं जान सकती हूँ — यह कक्षा शिक्षक विवेक अहीर की है?"
उसकी वाणी मधुर थी और रूप मोहक।

विवेक अहीर — अकादमी के यशस्वी, तारा-सदृश शिक्षक। उनकी कक्षाएँ सदैव विद्यार्थियों से परिपूर्ण रहतीं और उनकी ख्याति अगणित शिष्यों को आकर्षित करती थी।

अर्जुन पंडित  की दृष्टि में चमक कौंधी — "उसे मैं आकर्षित करूँगा!"

वह शांत मुद्रा में आसनस्थ हुआ, मानो कोई प्रबुद्ध आचार्य हो —
"
क्या आप उनके शिष्या बनना चाहती हैं?"

युवती के नेत्रों में प्रशंसा की आभा थी, किंतु उसने मस्तक हिलाकर कहा —
"
मैंने सुना है कि शिक्षक विवेक अहीर इस अकादमी के अद्वितीय विद्वान हैं। उनके शिष्यों की साधना अद्वितीय है, अतः उनकी कक्षा में सम्मिलित होना गौरव की बात है।"

अर्जुन पंडित  ने गंभीर स्वर में कहा —
"
अफवाहें सदैव सत्य नहीं होतीं। गुरु जूते के समान होते हैं — आवश्यक यह है कि वे उपयुक्त बैठें। चाहे शिक्षक कितना ही ख्यातिनाम क्यों न हो, यदि उसके उपदेश तुम्हारी प्रकृति के अनुकूल नहीं, तो साधना बाधित होगी।"

युवती ने विस्मय से कहा —
"
मेरे अग्रज भी ऐसी बातें कहते थे..."

यह देख अर्जुन पंडित  की आँखों में संतोष की चमक आई। उसने गम्भीरता ओढ़ ली —
"
निस्संदेह, हमारी भेंट नियति का संकेत है। मैं स्वयं इस अकादमी का शिक्षक हूँ। क्यों न मैं तुम्हारी प्रतिभा, प्रवृत्ति और प्रकृति का परीक्षण करूँ, और तुम्हारे लिए उपयुक्त आचार्य की अनुशंसा करूँ?"

युवती ने उत्साहपूर्वक स्वीकृति दी।

"अपनी साधना का प्रदर्शन करो!"

क्षणमात्र में युवती के घूँसे से कक्ष गूँज उठा; उसकी आध्यात्मिक ऊर्जा संगठित, तीव्र एवं गहन थी। अर्जुन पंडित  ने तन्मयता से अवलोकन कर सिर हिलाया —


"
तुम्हारी नींव दृढ़ है और प्रतिभा विलक्षण। एक दुर्लभ रत्न हो तुम!"

वह ज्योतिषियों की भाँति शब्दों का जाल बुन रहा था — अर्थगर्भित, किंतु अप्रमाण्य नहीं।

"विशेषतया, तुम्हारे चरणों की शक्ति — मानो कुण्डलित नाग की फुंकार हो। भविष्य उज्ज्वल है..."

"गुरुजी, मेरे पाँव में चोट है। वैद्य कह चुके हैं कि वह असमर्थ हो चुका है।"
युवती की वाणी ने उसके वाक्य को भंग कर दिया।

अर्जुन पंडित  लज्जित हुआ, किंतु शीघ्र ही वाकपटुता की शरण ली —
"
मैं जानता था! यही तो वह रहस्य है — संहार से ही सृजन जन्मता है। यह आघात ही तुम्हारे उत्कर्ष का द्वार बनेगा।"

युवती की आँखें कौतूहल से चमक उठीं —
"
कैसा अवसर, आचार्य?"

"ऐसा अवसर जो तुम्हें शिखर तक पहुँचा देगा। परन्तु... इसको पहचानने वाले शिक्षक दुर्लभ हैं। इस अकादमी में केवल तीन — जिनमें दो ने वर्षों पूर्व शिष्य लेना त्याग दिया है।"

युवती का मुख विषाद से आच्छादित हो गया। तभी वह बोली —
"
गुरुजी... आप तो अभी शिष्य ग्रहण करते हैं न?"

अर्जुन पंडित  ने मृदु मुस्कान के साथ कहा —
"
यदि रत्न उत्तम हो, तो मैं त्याग नहीं करता। किंतु, मैं प्रसिद्धि-लोलुप नहीं।"

क्षणभर पश्चात युवती भूमि पर नत होकर बोली —
"
कृपया मुझे अपनी शिष्या के रूप में स्वीकार कीजिए! मैं पूर्ण समर्पण से साधना करूँगी।"

अर्जुन पंडित  का हृदय हर्ष से पुलकित हुआ। यद्यपि मुख पर उसने संयम बनाए रखा —
"
हमारे बीच नियति का बंधन है।"

युवती ने तुरन्त अपना पहचान-पत्र अर्पित किया। अर्जुन पंडित  ने शीघ्रता से उसकी उँगली को चीरकर रक्त की बूँद उस पर चढ़ाई।

व्योम में प्रकाश की रेखा चमक उठी।
युवती विस्मित रह गई।

प्रकाश की उस कौंध के साथ ही जैसे ब्रह्मांड की सारी दिशाएँ क्षणभर के लिए स्थिर हो गईं। दीक्षा मुद्रिका पर रक्त-बिन्दु का स्पर्श हुआ नहीं कि एक मद्धिम दिव्य आभा उसके चारों ओर व्याप्त हो गई, मानो स्वयं नियति ने दोनों के बीच अटूट गुरु-शिष्य-संबंध की मोहर अंकित कर दी हो।

अर्जुन पंडित  ने गम्भीर मुद्रा में नेत्र मूंदे और धीमे स्वर में कहा—
"संस्कार पूर्ण हुआ। आज से तुम मेरी शिष्या हो — अर्जुन पंडित  के कुल की, मेरे ज्ञान-सरोवर की पहली कमलिनी।"

युवती की आँखों में विस्मय और श्रद्धा की अमृतधारा एक साथ उमड़ पड़ी। वज्र की तरह कठोर और चन्द्रमा की तरह सौम्य इस वाक्य ने उसके अन्तःकरण के सारे संशय, सारे भय जैसे वाष्पित कर दिए। वह पुनः भूमि पर मस्तक झुकाकर बोली—
"गुरु जी ! यह दैवी अवसर पाकर मैं कृतकृत्य हूँ। आपकी यश:कीर्ति और चरणों की सेवा ही अब मेरा जीवनधर्म है।"

अर्जुन पंडित  ने एक क्षीण मुस्कान के साथ सिर हिलाया, किन्तु हृदय में उल्लास की तरंगें समुद्र-सदृश उमड़ रही थीं। 'आख़िरकार, एक छात्रा तो मिली!', मन में वह बुदबुदाया।

किन्तु मुखमण्डल पर गम्भीर तपस्वी-जैसी छवि बनाए रखते हुए वह बोले—
"अब जबकि तुमने स्वयं को मेरी शिष्या के रूप में प्रतिष्ठित किया है, तुझे भी यह ज्ञात होना चाहिए कि मेरे पथ पर चलना सरल नहीं। यह साधना की अग्निपरीक्षा है; यहाँ पद-पद पर परीक्षा है, और हर परीक्षा में तपकर ही आत्मा कुन्दन बनती है। क्या तुम तैयार हो ?"

युवती ने बिना एक क्षण का विलम्ब किए दृढ़ नयन और प्रखर स्वर में कहा—
"गुरु जी ! शिष्यत्व के इस गौरवमय पथ पर, चाहे कांटे हों या अग्नि-कुण्ड, मैं अविचल भाव से आपके साथ चलूँगी।"

अर्जुन पंडित  ने प्रशंसाभरी दृष्टि से उसे देखा और मन ही मन सोचा—अच्छा है, अभिनय की मेरी कला रंग ला रही है!’
फिर उसने गुरुजनों की परम्परा का स्मरण करते हुए, गम्भीर वाणी में कहा—
"तो सुनो! शिष्य दीक्षा के साथ ही चार अनिवार्य विधाएँ होती हैं — आचार, विचार, व्यवहार और उपचार। इन चारों में दक्ष होने पर ही साधक सच्चा वीर्यवान बनता है। आज प्रथम उपदेश दूँगा — 'शिष्य-संहिता' का प्रथम सूत्र।"

यह कहकर वह कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। उसके चरणों की चाल में एक ऐसा धीमा तेज और गुरुत्व था मानो किसी आचार्य-मण्डल के मुख्याध्यापक का प्रवेश हो रहा हो। उसकी उँगलियों ने आकाश में मन्द गति से कुछ रेखाएँ खींचीं, जैसे अदृश्य सूत्रों को पकड़कर भूमि पर उतार रहा हो।

"ध्यान से सुनो!" — स्वर में गंभीरता ऐसी कि जैसे काल के प्रवाह को बाँध रहा हो —
"गुरु का शब्द शिष्य के लिए वाक्य नहीं — मंत्र है। गुरु की दृष्टि केवल दृष्टि नहीं — दीक्षा है। और गुरु का स्पर्श केवल स्पर्श नहीं — साधना है।"

युवती की आँखों में चमत्कारी भाव जाग उठा। ऐसा ज्ञान, ऐसा वाक्-विलास तो उसने कभी नहीं सुना था। सचमुच यह कोई साधारण शिक्षक नहीं — कोई सिद्ध महात्मा प्रतीत हो रहे थे।

अर्जुन पंडित  ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा—


"आज से प्रत्येक प्रातःकाल तुम शिष्य-संहिता का स्मरण करोगी। जब यह मन, वचन और कर्म में प्रतिष्ठित हो जाएगी, तब मैं तुम्हें अगला पाठ पढ़ाऊँगा।"

युवती ने श्रद्धापूर्वक सिर झुकाया।


इसी समय दूरस्थ घंटा-घड़ियाल की ध्वनि गूँज उठी — यह नव सत्रारम्भ की उद्घोषणा थी। पूरी अकादमी में चहल-पहल प्रारम्भ हो चुकी थी। अन्य शिक्षक अपनी-अपनी कक्षाओं में छात्रों का स्वागत कर रहे थे।

अर्जुन पंडित  ने आकाश की ओर दृष्टि डालते हुए मन ही मन कहा —
पहली बाधा पार हुई… परन्तु यह तो आरम्भ मात्र है।’
फिर वह युवती की ओर देखकर सौम्य स्वर में बोला —
"चलो, अब अपने दीक्षा-मुद्रिका पर हस्ताक्षर कर दो। तुम्हारा नाम इस गुरु-कुल के पत्रों में अंकित होना चाहिए। आज से तुम केवल मेरी शिष्या ही नहीं, वरन् मेरे कुल-मान की ध्वजा भी हो।"

युवती ने दोनों हाथों से दीक्षा-मुद्रिका को ग्रहण कर, विधिपूर्वक उस पर हस्ताक्षर किए। इसी के साथ नियति की रेखाएँ और अधिक स्पष्ट हो गईं।
अर्जुन पंडित  के नेत्रों में दूर दृष्टि का आलोक झलका —
अब गुरु का जीवन आरम्भ होता है… और एक नयी कथा भी।’

 

शिष्य दीक्षा के उपरान्त जब युवती ने दीक्षा-मुद्रिका पर अपने हस्ताक्षर अंकित कर दिए, तब वह दिव्य मुद्रा में कुछ क्षण स्थिर रही। जैसे एक अदृश्य शक्ति उसके अन्तःकरण में उतर आई हो। अर्जुन पंडित  ने अपने बाह्य-भाव में समता और शान्ति का अनुकरण किया, किन्तु अन्तःकरण में विजयघोष की गूँज थी —
अच्छा हुआ! अब मेरी गुरु-पदवी स्थिर हो गई। अब मुझे अकादमी में मान-सम्मान भी मिलेगा।’

किन्तु तभी, जैसे नियति अपनी अग्नि-परीक्षा की दूसरी धारा बहा रही हो, बाहर प्रांगण से तेज़ पगचाप और उग्र स्वर सुनाई पड़ा —
"कहाँ है अर्जुन पंडित ? अभी अभी समाचार मिला है कि उसने दीक्षा दी है? यह कैसे सम्भव है?"

कुछ क्षणों में ही एक भव्य व्यक्तित्व वाले पुरुष सभा में प्रविष्ट हुए। उनका वस्त्राभरण प्राचीन आचार्यों-सदृश था — उज्ज्वल श्वेत आच्छादन, रत्नजटित करधनी और तेजस्वी ललाट। यह थे — अक्षय सिंह , अकादमी के वरिष्ठ गुरु-मण्डल के महाध्यापक।

उनकी दृष्टि में कौतूहल और संशय एक साथ था। उन्होंने कठोर स्वर में पूछा —

"अर्जुन पंडित! तुमने क्या सचमुच किसी को दीक्षित कर लिया?"

अर्जुन पंडित  ने निर्विकार भाव से सिर झुकाया और शान्त स्वर में उत्तर दिया —
"आचार्यवर! हाँ, मैंने शास्त्र-प्रवेश की विधि से इस कन्या को शिष्यत्व प्रदान किया है। यह विधि-विधान और गुरु-परम्परा के अनुकूल है।"

अक्षय सिंह  की भृकुटि तन गई। उन्होंने तीक्ष्ण दृष्टि से युवती को देखा और पुनः अर्जुन पंडित  से बोले —
"पर क्या तुम जानते हो कि अकादमी के नियमों के अनुसार कोई भी शिक्षक तभी शिष्य-दीक्षा दे सकता है जब उसके ज्ञान-परीक्षा में उत्तीर्ण होने के प्रमाणपत्र हों? तुम्हारे पास तो अभी तक वह मान्यता नहीं है!"

यह वाक्य सुनकर सभा में उपस्थित कुछ अन्य शिक्षकों और शिष्यों के मध्य हलचल मच गई। कुछ ने तो मन्द-मन्द मुस्कराकर कानाफूसी भी आरम्भ कर दी —


"अरे! अर्जुन पंडित  तो स्वयं अभी तक अर्ध-शिक्षक ही है। फिर भी उसने दीक्षा दे दी? क्या यह नियम-भंग नहीं?"

अर्जुन पंडित  का मन कुछ क्षणों के लिए विचलित हुआ; परन्तु शीघ्र ही उसने आत्मसंयम धारण कर दृढ़ स्वर में कहा —
"आचार्यवर! सत्य यह है कि विधि का सर्वोच्च सिद्धान्त धर्म है, और धर्म का लक्षण लोकमंगल है। यदि मेरे ज्ञान से कोई शिष्य लाभान्वित होना चाहता है और मैं उसे मार्गदर्शन दे सकता हूँ, तो क्या उसे प्रतीक्षा कराने का पाप करूँ? क्या गुरु-धर्म इतना क्षुद्र है कि वह प्रमाणपत्रों की जंजीरों में बँधकर रह जाए?"

इस वाक्य में ऐसा आत्मबल और तर्क था कि सभा क्षणभर के लिए निस्तब्ध हो गई। अक्षय सिंह  के नेत्रों में भी एक क्षीण प्रशंसा झलक उठी, परन्तु उन्होंने मुखर भाव से कहा —


"अर्जुन पंडित! तुम्हारी वाणी ओजस्विनी है, परन्तु नियम तो नियम है। यदि तुमने दीक्षा दी है, तो उसके लिए आगामी सात दिनों के भीतर गुरु-परीक्षा में उत्तीर्ण होना आवश्यक है। यदि असफल रहे तो न केवल यह दीक्षा अमान्य होगी, अपितु तुम्हारी शिक्षक-पदवी भी संकट में पड़ सकती है। क्या तुम इस चुनौती को स्वीकार करते हो?"

सभा में पुनः एक आह्लाद और कौतूहल की लहर दौड़ पड़ी। सबकी दृष्टि अर्जुन पंडित  पर केंद्रित हो गई —
क्या यह नवोदित शिक्षक इस महान परीक्षा का साहस करेगा?


क्या उसकी विद्या इतनी प्रबल है कि वह अकादमी की गुरु-परीक्षा की अग्नि में सफलतापूर्वक तप सके?

अर्जुन पंडित  ने मन में एक दीर्घ श्वास ली। उसने अपने भीतर के अदृश्य 'ज्ञान सागर' — जो सिद्ध ज्ञान का अक्षय स्रोत था — का स्मरण किया। जिससे उसके हृदय में विश्वास उत्त्पन हुआ ।

उसने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया —
"आचार्यवर! मैं इस परीक्षा को सहर्ष स्वीकार करता हूँ। सात दिनों के भीतर मैं गुरु-परीक्षा में उत्तीर्ण होकर इस दीक्षा को वैध सिद्ध करूँगा। यही मेरा संकल्प है।"

अक्षय सिंह  ने क्षणभर उसे निर्निमेष देखा, फिर गम्भीर स्वर में बोले —
"तथास्तु! तुम्हें सप्ताह का समय मिलता है। तैयार रहो — परीक्षा कठिन है। किंतु यदि तुम सफल हो जाओ, तो यह दीक्षा इतिहास में अंकित होगी।"
यह कहकर उन्होंने सभा को छोड़ दिया। अन्य शिक्षकगण भी धीरे-धीरे विदा हुए।

युवती ने श्रद्धा-पूर्ण स्वर में अर्जुन पंडित  से कहा —
"स्वामी! मैं आपके साथ हूँ। यह परीक्षा हमारे गुरु-शिष्य-संबंध की अग्निपरीक्षा है। मैं तन-मन से सहायता करूँगी।"

अर्जुन पंडित  ने उसकी ओर मधुर दृष्टि से देखा और मन ही मन कहा —
अब समय है — 'ज्ञान सागर के अद्भुत रहस्यों का प्रयोग कर इस परीक्षा को विजयमाल्य बनाऊँ!’


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