अध्याय ३ — ' गुरु-परीक्षा की तैयारी और रहस्य ! अर्जुन पंडित ने अपने कक्ष में प्रवेश किया। कक्ष का वातायन संध्या की अरुणिमा से आलोकित था। आकाश में रक्त-धवल रश्मियाँ छिटक रही थीं , मानो स्वयं देवताओं की दृष्टि इस परीक्षा की तैयारी पर टिकी हो। अर्जुन पंडित ने एकाग्र चित्त से अपने हृदय-पटल पर ध्यान केंद्रित किया। जैसे ही उसने मन के अन्तरंग में अवगाहन किया , तभी ‘ ज्ञान सागर का अद्भुत द्वार एक बार पुनः उसकी चेतना में प्रकट हुआ। यह वह रहस्यमय ग्रंथालय था , जहाँ सम्पूर्ण विश्व की विद्या , शास्त्र और कलाएँ सूक्ष्म रूप में संचित थीं। वह मन ही मन बोला — " ज्ञान सागर! इस बार मुझे गुरु-परीक्षा के लिए तैयारी करनी है। मुझे उन समस्त विषयों की उच्चतम पुस्तकें प्रदान कर , जो अकादमी की परीक्षा में उपयोगी हों!" क्षणमात्र में दिव्य ज्योति से आलोकित असंख्य ग्रंथ उसके मानस में प्रकट हुए। — ‘ शरीरशास्त्रम्’ , — ‘ तंत्रविद्या’ , — ‘ औषधिज्ञानम्’ , — ‘ धातुशास्त्रम्’ , — ‘ युद्धविद्या’ , — ‘ संवादशास्त्रम्’ इत्यादि असंख्य ग्रंथों के शीर्षक स्वर्णाक्षरों में चमकने लगे। प्र...
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अध्याय २ — निर्लज्जः लाइब्रेरी में कुछ देर इधर-उधर टहलने के बाद अर्जुन पंडित को सत्य का बोध हुआ— " दोपहर के भोजन का समय हो गया है। भोजन के बाद , मैं दो और लोगों को मनाने का कोई उपाय ढूँढूंगा।" खिड़की से बाहर झांकते ही उसे प्रतीत हुआ कि दोपहर हो चुकी थी। सुबह के अठारह छात्रों में से वह मात्र एक को ही अपने साथ जोड़ पाया था। उसकी स्वीकृति दर वास्तव में अत्यंत निम्न थी। इस गति से दोपहर में आगे बढ़ना संभव नहीं था। आखिर , वह एक पारलौकिक यात्री था! यदि वह प्राचीन काल के लोगों को भी प्रभावित न कर सका , तो सूचना-युग से आए होने का दावा कैसे कर सकता था ? अपनी कमर सीधी करते हुए वह व्याख्यान-कक्ष से बाहर निकला और कैंटीन की ओर बढ़ चला। मोदीनगर अकादमी की कैंटीन , उसके पिछले जीवन के हाई स्कूलों की तरह , विशाल थी। यह इतनी विस्तृत थी कि दस हज़ार से अधिक छात्र एक साथ भोजन कर सकते थे। एक छात्र को भर्ती करने के बाद उसका मन कुछ हल्का हुआ था। उसने कुछ अतिरिक्त व्यंजन मँगवाए और कोने में बैठकर भोजन का आनंद लेने लगा। " अरे , क्या यह शिक्षक अर्जुन पंडित नहीं हैं ?" वह प...
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अध्याय १ -शिष्य का चुनाव " ठग! महान ठग!" एक उग्र गर्जना आकाश में गूँज उठी। नीलाभ पत्थर-खंडों से बने पथ पर दौड़ती पदचापों की ध्वनि वातावरण को चीरती चली गई। अर्जुन पंडित ने दोनों हाथ विवशता से फैलाए। उसके अधरों पर वेदना मिश्रित प्रत्याख्यान फूट पड़ा — " मैं कोई ठग नहीं , प्रभु! मैं तो अकादमी का एक साधारण शिक्षक हूँ... मैं केवल तुम्हें अपना शिष्य बनाना चाहता हूँ। और यह ' महान ' उपाधि देकर तुम मेरे अपराध को ऐसा चित्रित कर रहे हो मानो मैं अनन्तकालिक दोष का भागी हूँ !" मौन के क्षण में , स्मृतियों की शृंखला उसके मानस-पटल पर अंकित हो उठी — निदेशक की चेतावनी-रूप वाणी : " यह सत्र का सत्रहवाँ अवसर है! यदि आज भी कोई छात्र न मिला , तो कल ही अपना संसार समेट लेना होगा!" वह इस अकादमी का सबसे विपन्न , सबसे उपेक्षित शिक्षक । जहाँ अन्य शिक्षकों की कक्षाएँ जिज्ञासुओं से भरपूर थीं , उसकी कक्षा में एकाकीपन का साम्राज्य था। यदि वह किसी शिष्य को मनाकर लाता भी , तो वह उसे ' ठग ' कहकर पलायन कर जाता। पिछले वर्ष की शिक्षक-योग्यता परीक्षा में वह सम्...